Alone Shayari Collection :- किसी को अपनी पहली मोहब्बत याद आती है, किसी को बिछड़ा हुआ दोस्त, किसी को परिवार की याद और किसी को अपने संघर्षों की तस्वीर दिखाई देती है। यही वजह है कि हमारी शायरियाँ सीधे दिल तक पहुँचती हैं।
-) ज़िंदगी की बागडोर अब ख़त्म सी लग रहीं हैं,
हमारी कहनी अनजाने मोड़ पर ख़त्म हो रहीं हैं ।।
ये मेरी मंज़िल का रास्ता तो नहीं,
फ़िर भीं ये कहानी अनजाने सफ़र में जा रहीं हैं ।।
-) टूटे दिल का हाल ना पूछों,
ये जरा सी बातों पे समंदर बहाने लग जाता हैं ।।
किसी ग़ैर की बात होती तो सोच भीं लेता,
ज़ख्म किसी अपने करीबी के हैं ।।
-) बेशक उन्हें ना मंज़ूर हूं मैं,
मैंने भीं कब कहां की मुझे हासिल हो वो ।।
रब को चाहने वालें भीं तो बहुत हैं,
हरकिसी को रब मिलता तो नहीं ।।
-) मुझ जैसा होनें में वक़्त नहीं ,
सदिया गुज़र जाएंगी ।।
ख़ुद को ऐसा बनाने में ,
हमनें भी तो उम्रे गुज़ार दी ।।
-) मैं ये तो नहीं कहता,
हर पल मेरे क़रीब रहों ।।
बस इतना ही कर दिया करों,
मैं जब चाहूं तुम्हारी तस्वीर को हमारे पास भेज दिया करों ।।
-) माना कि मिलनें में जाने कितनी मुसीबतें हैं,
मग़र इस दिल के आगे सब बेबस हैं ।।
हम चाहकर भीं कुछ कर नहीं पाते ,
बेड़ियों में हम क़ैद हैं ।।
-) मेरे हाथ में क्या क्या हो सकता था,
क़लम के सिवा कुछ ना थामा मैंने ।।
होनें को क़ातिल भीं हो सकता था ,
लेकिन तुझसे बिछड़ कर शायर ही बन गया मैं ।।
-) जो बातें सबको समझानी पड़ रहीं हैं,
एक शहजादी बिन बोलें समझ जाया करती थीं ये सब ।।
मैंने कभी ये नहीं कहाँ कि ना समझने में ग़लती तुम्हारीं हैं,
वो बस प्रेम की भाषा समझती थीं ।।
-) आँखें बोलने लगीं कितना कुछ ,
सब कुछ बयां कर देती हैं बग़ैर बोलें कुछ ।।
हम भी कुछ कहना चाहते नहीं हैं,
इनकी जुबां समझले बस कोई ,
उसके अलावा फ़िर हमारा कोई नहीं ।।
-) मैं आसमान को लिख रहा हूं ,
तो ज़मीन क्यों लिखा जा रहा ।।
शायद इसे हिदायत रब कि समझूं मैं,
आसमान देखने वालों को ज़मीन नसीब नहीं होती ।।
-) उसके बग़ैर दिल लगता तो नहीं ,
लेकिन ये ज़रूरी भीं तो नहीं कि कभी लगेगा ही नहीं ।।
वो इस भ्रम में भी ना रहें आशुतोष,
उसके बाद बस उसे ही याद किया जाता हैं ।।
-) एक पैग़ाम में अगर तेरे नाम लिख दूं ,
तेरे घर का पता लिखूं फ़िर तेरा नाम सरेआम लिख दूं ।।
तो मुमकिन ये भीं हैं,
बदनामी का सबब तेरे सिर होगा ।।
जिन बातों से पर्दा करता हैं तू
फ़िर वो पर्दा भीं ना होगा ।।
-) हम तेरी जान की क़ीमत का मौल ना कर पाएं ,
किसी ने धन दौलत मांगी थीं ।।
हम ये सौदा ना कर पाएं ,
हम बस एक ही काम कर सकें ,
तेरी जान के बदलें हम अपनी जान कर आएँ ।।
उन्हें ये मंज़ूर ना था ,
तो हम सौदा ही ख़ारिज कर आएं ।।
-) बीतें दौर से कुछ ना कुछ तो सीखिएं,
उसे यूं ही ना जाने दीजियें ।।
उसके जाने में ना जाने कितने अहम मौके चलें गए,
उन मौकों की क़ीमत को अदा कीजियें ।।
-) हम अगर ख़ुद को भुलाने लगें,
तो क्या क्या हो सकता हैं ।।
एक दुनिया बनी हैं हमारे ठिकाने पर ,
उसका तबाह होना तय हो सकता हैं ।।
कितने दिल है क़रीब उसके ,
उन सभी का टूटना हो सकता हैं ।।
~~~आशुतोष दांगी~~~
-) जो नज़्मों में ना कह सके,
कविता में वो सब कह सके।
-) कविता नहीं कोई खेल है,
ये तो भावनाओं की रेल है।
-) कविता जब दिल से निकले,
हर पत्थर को मोम कर दे।
-) एक कविता ने समझा मुझे,
जब पूरी दुनिया ने ठुकरा दिया।
-) कविता की एक-एक पंक्ति,
दिल की चुप्पी तोड़ दे सख़्ती।
-) कविता बस लफ्ज़ नहीं होती,
ये रूह की तहरीर होती।
-) जब तन्हा हों, कविता पढ़ लेना,
खुद को फिर से नया कर लेना।
-) कविता है ख्वाबों की उड़ान,
जिसमें बसता है सारा जहान।
-) कविता हर सोच का गहरा सागर है,
इसमें डूबना ही असली सफ़र है।
-) कविता है माँ की ममता सी,
हर दर्द को प्यार से सह लेती सी।
-) कविता में कुछ ख़ामोशियाँ गाती हैं,
बिना बोले भी बहुत कुछ कह जाती हैं।
-) कविता में बचपन भी होता है,
और बुढ़ापे की समझ भी सोता है।
-) कविता वो दरवाज़ा है जो हर दिल को खोले,
हर जज़्बात को एक कहानी बोले।
-) कविता नहीं बस छंदों की रचना,
ये आत्मा की निश्छल अभिव्यक्ति है सच्चा।
-) कविता जब दिल से उतरती है,
तो ज़िंदगी कुछ और सी लगती है।
-) चुपचाप चलते हैं हम भी ज़िंदगी की राहों में,
कभी किस्मत से, कभी हौसलों की पनाहों में।
-) तेरा जिक्र हो और दिल ना धड़के,
ऐसा तो कोई मौसम भी नहीं देखा।
-) हर ख्वाब पूरा हो ये ज़रूरी तो नहीं,
कुछ अधूरे भी बहुत खूबसूरत होते हैं।
-) वो लम्हे भी क्या खास हुआ करते थे,
जब तुम पास हुआ करते थे।
-) जितना टूटा उतना ही संवर गया,
मैं खुद से ही फिर प्यार कर गया।
-) तेरे बिना सब अधूरा सा लगता है,
जैसे दिल में कोई खाली सा कोना रह गया।
-) धूप में चलकर भी साया नहीं छूटा,
तेरी यादों ने हर कदम पर साथ निभाया।
-) सपनों को सच्चाई का नाम चाहिए,
हौसलों को थोड़ी उड़ान चाहिए।
-) ना शिकवा रहा, ना शिकायत कोई,
हम खामोशी में भी कह गए हर बात अपनी।
-) हर मोड़ पर तुझसे ही मुलाक़ात हो,
ज़िंदगी का सफ़र !
~~~आराध्यापरी~~~
हर पाठक हमारे लिए खास है। जब कोई व्यक्ति हमारी किसी शायरी को पढ़कर मुस्कुराता है, भावुक होता है या अपने जीवन से जुड़ा हुआ महसूस करता है, तो हमारा प्रयास सफल हो जाता है।
हम मानते हैं कि शायरी लेखक की नहीं रहती; वह उस हर व्यक्ति की हो जाती है जो उसे अपने दिल से पढ़ता है।
-) हम जैसा अगर आंखों में आंसु लाने लग जाएं ,
कोई और बात बनाने लग जाएं ,
तो समझना गहरे ज़ख्म आ गए हैं दिल पर ।।
-) वक्त संभलने का मौका भी नहीं देता,
जिसे चाहते रहे ताउम्र उसकी एक झलक भी नहीं देता ।।
-) मेरे अच्छे होने को जानते हैं बस दो लोग,
एक आईने में छुपा वो शख़्स,
दूजा मेरा यार सनम ।।
मैंने आईना देखना बंद कर दिया ,
दूजे ने मुझसे मिलना छोड़ दिया ।।
अब जो बचा वो केवल बुरा हूं मैं ।।
-) मेरी मोहब्बत को बस परिंदों ने जाना हैं ,
कैद को पार करना कैसे ये बस उन ने जाना हैं।।
वे भी कभी आजाद ना हो सके ,
मैंने खुद हमेशा क़ैद ही माना ।।
-) दायरे में रहकर इश्क़ करना इतना आसान नहीं ,
ना जाने कितनी बातों पर मन मारना पड़ता हैं।।
मिलने कि चाहता हो फिर भी अकेले घुटना होता हैं,
जमाने से ग़म छुपाना और मुस्कुराता चेहरा दिखाना पड़ता हैं।।
-) इश्क़ हद से ज्यादा जो हो जाएं तो सजा ही समझो,
या तो उस से बढ़ चलो या उसकी सुनते रहो ।।
वो जो कह दे कुछ ग़लत तो उसको भी सही समझो,
वो रात को दिन और दिन को रात तो वो ही समझो।।
-) शक्ल में क्या क्या राज़ छुपने लगे हैं,
अपनों से बात छुपने लगे हैं,
एक नक्श हैं मेरे बयान में ,
उसे बदलने लगे हैं ,
ग़ैर समझने लगे हैं बेअदबी पेश करने लगे हैं।।
-) अब तो वो भी दूर होने लगे हैं,
जो सबसे क़रीब थे कभी ।।
हमसे ख़ुद को अलग करने लगे हैं,
जो हम में थे कभी ।।
लगे यूं के अब समझदार होने लगे हैं,
जो नासमझ थे कभी ।।
-) उनकी अक्ल जाने कैसे ख़त्म हुईं,
ज़माने से अक्लमंद थे जो कभी ।
उनकी बातों पे फ़ूल झड़ते थे कभी ,
आज कांटों सी बरसात हो रही हैं।।
-) ये दलीलें यूं पेश ना कर ,
मैं सच से रुबरु ख़ास हूं ।।
मैं अनदेखा कर देता हूं ,
तेरे सच से बाकीफ़ आज भी हूं ।।
समझते हैं वे के कुछ खास नहीं हैं,
मगर मैं सच में बहुत ख़ास हूं ।।
-) मोहब्बत की गली में ना आना आशुतोष ,
यहां बेवफ़ाई रुसवाई के सिवा कुछ भी नहीं ।।
दिल लगाने वालों के दिल में ,
गिले सिकवे तमाम हैं, मगर प्यार नहीं।।
जी करता हैं तेरा दिल दुखाने वालों को,
एक आग में झोंक आऊं मगर उसके बाद ,
तेरे होश हवास का पता नहीं ।।
-) जो इजाज़त दे आशुतोष तू तो ,
दिल की बस्ती क्या बेवफाओं के शहर में आग लगा दूं।।
मुमकिन क्या नहीं फिर ,
इनसबका नामों निशान मिटा दूं ।।
-) उसके और मेरे रिश्ते को ना जाने क्या नाम दिया गया ,
मुझे तो केवल बेवफ़ा बुलाया गया ,
दिल तोड़ा गया नक़ाब में पेश किया गया ,
जो कुछ होती इजाज़त बताने कि,
तू जुबान पे ताला लगाया गया ,
बेगुनाह को गुनहगार ठहरा दिया गया ,
उनके दिल से निकाल दिया गया ,
मुझे बर्बादी के आख़िरी मुकाम पे छोड़ा गया ।।
-) मैंने ख़ुद से वादों की एक आस रखी,
ख़ुदने ही उसे तोड़ रखी ,
मंजूर ना थी जुदाई मुझे ,
उसने ऐसी बात रखी मुझे मेरी ख़ुदाई छोड़नी पड़ी ।।
-) ऐ ख़ुदा अबके दिलदार झूठा ना देना,
दिल लगाना मगर मुझे धोखेबाज ना देना ।।
चाहे जान ले लेना ,
लेकिन जान से प्यारा ना देना ।।
~~~आशुतोष दांगी~~~






























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