Heartbreak Shayari Collection :- शायरी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उसकी आत्मीयता है। यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की कहानी होती है।
*लोग शायरी से इसलिए जुड़ते हैं क्योंकि—*
- इसमें उन्हें अपने जीवन की झलक दिखाई देती है।
- यह कम शब्दों में गहरी बात कह देती है।
- इसे पढ़ना और साझा करना आसान है।
- यह भावनाओं को सुंदर अभिव्यक्ति देती है।
- यह हर आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित करती है।
«"कुछ लोग शब्द पढ़ते हैं,
कुछ लोग एहसास महसूस करते हैं।"»
यही एहसास शायरी को अमर बनाता है।
-) वो दूर हैं मुझसे तो क्या हुआ,
हर दफ़ा मेरे सीने में दिल बनकर धड़कता तो हैं।।
उसके बग़ैर दिल तो भी लगता ,
मग़र फ़िर भीं वक़्त कटता तो हैं।।
-) बड़ी मन्नतों से उसे मांगा बाबा भोलेनाथ से,
कैसे उसका अनादर कर सकता हूं मैं।।
वो उनकी रहमत हैं,
जिनके आगे हर सिर झुकता हैं।।
-) तू कहीं दूर का मुसाफ़िर नहीं,
तेरी दौड़ मेरे दिल तक की हैं,
इसके आगे की आज़ादी तुझे तो नहीं।।
-) नादान दिल धड़क गया क्या ख़ूब हैं
तेरे नाम से धड़कन बड़ा दी इसने क्या खूब हैं ।।
हम तुझे अजनबी अंजान समझते थे
अब तेरे साथ हैं क्या ख़ूब हैं ये ।।
-) हम पतझड़ के बिछड़ने वालें,
जाने कब सावन कि आस करेंगे ।।
एक अरसे से वो भीं लौटा नहीं,
जाने कब उसके लौटने की उम्मीद करेंगे ।।
-) हम बर्बाद हो जाना चाहते हैं,
ये भीं क्या अजीब बात हैं।।
हम आबाद हीं कब थें,
जो अब बर्बाद होंगे ।।
-) मुझे ज़माने भर की बातें,
सुनना भीं पसंद नहीं ।।
बातें मेरे सहने की करते हैं ये ,
सिंहों ने डरना सीखा ही नहीं ,
किसी और से बेख़ौफ है हम,
ज़माने के उस दौर से ।।
-) कभी आंखों में मिल हैं वो मेरे,
कभी दिल में धड़कता हैं वो मेरे ।।
वो पायल की छन छन उसकी ,
सरगम मिलता हैं कानों में मेरे ।।
-) भटक रहें हो राह तुम ,
ये शब्द अच्छे तो नहीं हमको ।।
राहें बनाईं हैं हमनें,
तो भटकना मुमकिन नहीं ।।
-) दर्द हद से बढ़ जाएं तो दवा लिजिएं,
महबूब की बातें मानियें और उसे ख़ुदा कीजियें।।
ना कोई उसके सिवा ,
वो ही हैं सबसे क़रीब ज़माने भर से उसे ज़ुदा कीजियें ।।
-) मैं बर्बादियों की अंतरिम हद पे था ,
उसके बाद बस तबाही का मंज़र था ।।
मुझसे ख़बर ना पूछियें कि क्या बच सकता हैं,
मैंने बचने की बातों को भी ,
बस वहीं तबाह किया हैं।।
उन्हें आदत थीं वीरानेपन की ,
मैं अकेला कहां रहता ।।
उसे ना मंज़ूर था मैं,
और उसके बग़ैर मैं ख़ुद को न मंजूर था ।।
उसने अपनी सी करने की ठानी ,
और मैंने उसका होने कि ।।
-) मैं ख़ुदको आफतों में जाने कब ले आया ,
दिल का सौदा भरे बाजार कर आया ।।
लोगों को मंज़ूर ना होती एक पल की आफत,
मैं ताउम्र के लिए उसे सिर ले आया ।।
-) मुझे हराने वो आएं ,
जिसके आगे मैं अस्त्र ही ना उठा पाया ।।
होता क्या हार कबूल ना थी बग़ैर लड़े ,
मैं फ़िज़ूल में अपनी जान गंवा आया ।।
-) उसके आगे हर फ़ैसला मुझे क़बूल था ,
वो मौत लिखता मुझे फांसी का फ़ैसला मंज़ूर था ।।
जो मुकदमा फ़िर किसी और के हाथ गया ,
ये बाघी फ़िर बग़ावत पे आ गया ।।
कायदे क़ानून सबकी आँखों में धूल झोंक गया ,
फ़िर मैं हवा हो गया आंधी सा छा गया ,
मेघों की तेज़ गरजना सा गरज ही गया ।।
-) खैर छोड़ो उनकी बातें,
रब ही जाने उनकी बातें।।
जो उलझा लेते थे हमें कभी ,
अब कर रहें हैं ना जाने कैसी बातें।।
बड़ा गुरुर हैं उन्हें अपने आप पर ,
चलो कर लेते हैं फिर तुम्हारे जैसी बातें।।
~~आशुतोष दांगी~~
वर्तमान समय में हिंदी शायरी का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक व्यापक हो गया है। सोशल मीडिया ने इसे नई पहचान दी है। आज लाखों लोग इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब और ब्लॉग्स पर अपनी रचनाएँ साझा कर रहे हैं।
डिजिटल माध्यमों ने शायरी को नई पीढ़ी तक पहुँचाया है। आज छोटी-छोटी शायरियाँ रील्स, स्टेटस और पोस्ट के माध्यम से कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती हैं।
ऑनलाइन मंचों ने नए रचनाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया है। अब साहित्य केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर मोबाइल स्क्रीन तक पहुँच चुका है।
1. बेरोजगारी की मार ने हमें तोड़ दिया,
सपनों के शहर में हौसले की बारिश रोक दिया।
2. रोज़गार के दरवाजे पर खड़े हैं हम,
उम्मीदों के बादल में छाई है ग़म।
3. खुद की मेहनत पर अब भरोसा नहीं रहा,
हर सुबह खाली हाथ लौटना, ये तो सज़ा है।
4. हर चौराहे पर मिलते हैं हज़ारों चेहरे,
उम्मीदों की परवाह किए बिना, सिर्फ अधूरे सपने।
5. कभी मेहनत का फल मीठा होगा,
पर आज बेरोज़गारी का ग़म, दिल को खा रहा।
6. सपने हैं ख्वाबों की तरह, पर कसरत नहीं है,
बेरोजगारी की लकीरें, हाथों में खिंच गई हैं।
7. उम्र भर की महनत, कहीं खो गई,
नौकरी के वादे अब बस कहानियाँ हो गई।
8. इस महंगाई के युग में, कोई सुने ना,
सब हैं परेशान, किसको पता अपनी क़िस्मत की रेखा।
9. हर दिन की ख़्वाहिश, बस एक नौकरी है,
लेकिन फिर भी गहरी रात की खामोशी है।
10. काम के चक्कर में, दिन गुजर जाते हैं,
बेरोजगारी के साए में, हम सब सड़ जाते हैं।
11. मिट्टी में मेहनत की गंध होती है,
पर बेरोजगारी के बयार में कोई सुनने वाला नहीं।
12. ख्वाबों में भी अब वो चाहत नहीं रही,
बेरोजगारी के साये ने, जोस की बात नहीं रही।
13. आत्मनिर्भरता के ख्वाब देखने चले थे,
लेकिन हाथ खाली रह गए, ये दिन देख कर।
14. बीते लम्हे लौट कर नहीं आने वाले,
बेरोजगारी के शिकंजे में हम सब फंसे रहने वाले।
15. हर दिन ताज़ा होती हैं खबरें बेरोज़गारी की,
पर दिल में उमंग फिर भी, नहीं जाने क्यों है ज़िंदगी की।
16. सपने देखे थे हम, ऊँचाइयों की ओर,
लेकिन अब तो ठोकर खा रहे हैं, मंदी की होर।
17. कदम दर कदम बढ़ते रहे, रास्ता खोते रहे,
बेरोजगारी की राह में सपने हम बोते रहे।
18. आसमान छूने की चाहत में बेमिसाल थे हम,
पर बेरोजगारी की दीवार ने रोका हमें।
19. संसार की सड़कों पर घूमते फिरते हैं,
बेरोज़गारी की ग़मों में, बस तड़पते हैं।
20. हर इक चेहरे पर शिकन, दिल की परेशानियों की है,
बेरोजगारी की आग में, हर ख़ुशी की परछाई है।
21. मेहनत के बादल छाए, फिर भी चांद दूर है,
बेरोजगारी की गहराई में, ये सब बुनियादें जरूर हैं।
22. भविष्य की सोच में, आज खो गए हैं,
बेरोजगारी की काली छाया में, हम सब डूब गए हैं।
23. हर दिन की तलाश में, गम भुलाने निकले,
बेरोजगारी की गली में, हम अकेले ठोकर खाए।
24. काम की ख्वाहिश में, उम्मीदें बुनते हैं,
पर बेरोजगारी के अंधेरे में, हम खुद को भुलाते हैं।
25. खुद की मेहनत से अब उतरने लगे हैं,
बेरोजगारी के इस सागर में, सब खुद को खोने लगे हैं।
शायरी केवल व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि समाज और संस्कृति का दर्पण भी है। यह प्रेम, भाईचारा, मानवता, समानता और नैतिक मूल्यों का संदेश देती है।
शायरी विभिन्न पीढ़ियों के बीच भावनात्मक पुल का कार्य करती है। यह भाषा को समृद्ध बनाती है और साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाती है।
आज भी अनेक कवि सम्मेलन, मुशायरे और साहित्यिक आयोजन हिंदी शायरी की लोकप्रियता का प्रमाण हैं।
~~~आराध्यापरी~~~
-) वो जो हैं, जिससे हम मोहब्बत करते हैं
वो क़यामत ढाते हैं ।
अगर जिक्र हो उनकी काली जुल्फों का ,
तो मेघ गरजना शुरू कर देते हैं ।
अगर दीदार हो उनकी झील सी गहरी आँखों का,
तो समन्दर रूठ जाते हैं ।
सुना हैं गुलाबो से भी उनकी कुछ खास बनती नहीं,
जो देख ले उनके होंठो की लाली ,
तो गुलाब अपनी पंखुड़ियों के रंग बदल ले ।।
-) आजकल खुद ही के गमों को देख मुस्कुरा देता हूं मैं,
वरना जमाना तो मेरी खुशियों में भी गमों की बारिश कर देता हैं ।।
जाने क्यों रूठ जाते हैं मुझसे मेरे परवाने बस ,
सारी उम्र उन्हीं को मनाने में गुजार देता हूं मैं ।।
-) एक बार जो तेरे दर पर आए, फिर कोई दर ना चाहा हमने,
माँगा तुझसे बस, और किसी से कुछ ना माँगा हमने ।।
श्रापित चंद्र को जब कोई ना सहारा,
तब मस्तक पर सजाया तुमने ।।
तुम त्रिलोकी नाथ इस जहां भर को तुममें झांका हमने ,
जब गंगा भागीरथी बनने चली, तब जटाओ में समाया तुमने।।
अंधकार मय जब ये जहाँ हुआ,
तब सूर्य बनकर उभारा तुमने,
जब आन पड़ा संकट धरा पर,
विष को कंठ में उतारा तुमने।।
मैं अज्ञानी हूँ मुझ पर कृपा कर दो,
जिस तरह शनि को तारा तुमने ।।
-) मृत को जीवित करदे वह संजीवनी हैं शिक्षक ,
अंधकार को प्रकाश करदे वह सूर्य की किरण हैं शिक्षक ,
अज्ञानी को ज्ञानी करदे वह गीता का सार हैं शिक्षक ।।
खुद स्थिर रहकर पूरे विश्व को घुमादे वह मन की गति हैं शिक्षक,
शब्दों से जिसका बखान ना किया जाए वह शब्दकोश हैं शिक्षक ।।
-) एक तो गफलत भरी जिंदगी मेरी ,
ऊपर से ना जीने का सवाल ,
फिर उसपे बाजारों में मैं सरेआम बदनाम मेरा नाम ।।
-) महफिलों में उनकी नाम बदनाम मेरा कोई कर गया ,
उसको तो थी खबर मेरी मगर ना जाने फिज़ा कहा की थी,
जाने वालों में सबसे पहले मेरा हमसफर गया ।।
मैं उससे पूछता मगर मेरी मोहब्बत को हवा कोई अंजान कर गया ।।
-) ना जाने किस दौड़ का हिस्सा हूं मैं,
जब भी किसी मुकाम पे पहुंचा तो लगा कि जैसे यह मेरा मुकाम नहीं।।
भटकता तो नहीं मैं कहीं मगर ,
अभी तक उस ठिकाने का अंजाम भी हासिल नहीं।।
चले थे कुछ लोग साथ में मेरे मगर जाने कहां गुम हो गए सारे ,
खाली रास्तों पे कोई साथी भी तो नहीं।।
जिंदा हूं मैं एक लाश सा ,
मगर फिर भी मुझे मौत का इंतजार क्यूं नहीं।।
जाने वालों को रोका तो मैंने बहुत ,
लेकिन उन तक मेरी आवाज भी तो पहुंची नहीं।।
समझ लेते बस बात इतनी वो ,
तो दरबदर ना भटकता मैं,
खैर छोड़ो उनको तो इसकी खबर भी नहीं।।
-) आप से पहले हम कुछ खास तो ना थें ,
माना कुछ थें पर यार जो हैं अब वो तो ना थें ।।
खुदमें यूं मसरूफ थें ,
जमाने से कुछ यूं बेगाने थें ।।
पहले पूछते लोग तो कह देते थें ,
जैसे भी थे ठीक थें ।।
अब जो नयापन हमपर आया ऐसे तो ना थें ,
लोग जलते हैं अब मेरे खुश रहने पे ,
कहते हैं जैसे ये पहले थे बिलकुल ठीक थें ।।
-) लोगों से ज़रा गौर से पुछो किसने क्या गवायां हैं,
फिर हमसे पूछो हमनें क्या गवायां हैं ।।
चैन सुकून वो क्या होता हैं ,
ये तो हमनें बचपने में खोया हैं ।।
एक उम्र तो गुजार दी जागते जागते ,
हमने आंखों पर भी बड़ा जुल्म ढाया हैं।।
ये चाहती थी बंद हो जाना ,
मगर हमने इनको हर पल खुला रखा हैं।।
अब मरीज से इलाज पूछते हैं,
वो जिन्होंने हमें मरीज बनाया हैं।।
की इतनी खूबसूरत क्यों होती हैं,
ये राते मैंने टिमटिमाते तारों में उसको पाया हैं।।
सोचता हूं बंद आंखें क्या देखेगी ख्वाबों को ,
मैंने खुली आंखों से उसके ख्वाबों को सजाया हैं।।
-) मंजिलें मिली तमाम लोगों को ,
मैं सफर के इंतजार में बेसुध रहां ।।
पहुंचे वो भी वक्त पर जो मुझसे बाद में घर से निकलें,
मैंने ना जाने किस कदर वक्त गवायां ।।
उम्मीदें तमाम थी खुद से हमकों भी ,
मगर ना जानें कहां ख्वाब टूटे कहां हम ।।
उम्र भी यूं क्यूं बढ़ती हैं,
जरा क्या ठहरे लगने लगा यूं बचपने से बुढ़ापे में आ गुजरे ।।
मैं खुद को तलाशता हूं , खुद की तलाश में ,
वो शख्स हां मैं ही अब खुद से अनजान हूं ।।
-) मोहब्बत का ज़िक्र इस दहलीज के अंदर ना किया करो ,
हम दोनों ने मोहब्बत में कई दहलींजे लांघी थीं।।
हुआ क्या फिर वो अपने रास्ते ,
और हम अपने रास्ते हो गए ।।
उसको तो अब शायद याद भी नहीं मैं,
लेकिन मेरे दिल पे उसके ताजे जख्म रह गए ।।
भुलाने चाहते हैं उसको मगर ,
लेकिन हर दफा उसकी यादों में उसके होकर रह गए ।।
अब जो हम ना रहें तो कहना उनसे ,
कोई था जो खुदा समझता था आपको और आप केवल इंसान बनके रह गए ।।
खैर छोड़ो अब उसकी बातें अब दामन हमनें माटी का थामा हैं,
इस माटी के थें ,
और इसी माटी के होकर रह गए ।।
-) हसीनाओं को तो बेवजह बदनाम किया गया हैं,
मेरी जवानी तो किताबों ने खायीं हैं।।
मैं उलझा रहा इन किताबों में कहीं ,
आशिकी ना जाने जमाने में किस - किस ने कहां लड़ाई हैं।।
-) तू नहीं तो ये सावन भी अच्छा नहीं लगता,
सबकुछ होता हैं पास लेकिन तेरे होने सा नहीं लगता ।।
मैं बैठ जाता हूं नदी किनारे,
मगर अब तो दिल वहां भी नहीं लगता ,
चिल्लाता हूं वादियों में तेरे नाम को,
लेकिन वहां भी कोई जवाब नहीं मिलता।।
हम तन्हां हैं आकर देख यूं गैरों से हाल मेरा पूछना,
मेरी जान मुझको तो तेरा ये रवैया बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता ।।
-) फूल गुलाबों को मुझसे जाने गिला इतनी क्यूं ,
हर वक्त पूछते हैं,
गुलाब को गुलाबों कि जरूरत क्या ।।
-) हमारी शान तिरंगा,
हर दिल हिंदुस्तान तिरंगा ।।
इसकी खातिर वीरों ने त्यागे प्राण ,
उनका बलिदान तिरंगा ।।
जिसके प्रथम रंग से शौर्य भर जाए रगों में,
ऐसा चिंहित मान तिरंगा ।।
अमन शांति
का पाठ पढ़ाए,
रंग सफेद से हमें बताएं,
ऐसे गुरु का मान तिरंगा ।।
जिसके रंग आखिरी से,
उन्नति हरियाली की दिख जाए,
झलक एक ऐसी पहचान तिरंगा ।।
~~~आशुतोष दांगी~~~
-) तेरी आँखों में जो नशा है, वो शराब से कहीं गहरा है,
पी भी लूँ अगर, होश फिर भी तेरा ही चेहरा है।
-) वो जब देखती है पलट के, सारा शहर झूम जाता है,
तेरी आँखों का ये नशा हर दिल पे छा जाता है।
-) शराब पी के भी जो नशा न चढ़ा,
तेरी आँखें देख लीं — और दिल बहका।
-) तेरी नजरों का असर कुछ ऐसा चला,
पीने वालों ने जाम को ठुकरा दिया।
-) उसकी आँखों में देखा जो, जाम खुद से टूट गया,
नशा ऐसा चढ़ा कि खुद को ही भूल गया।
-) तेरी आँखों की गहराई में डूबा जो,
फिर न किनारा मिला, न खुदा मिला।
-) तेरी नजरों की मस्ती जब चली,
सारा आलम झूमने लगा दिल से दिली।
-) उसकी एक नजर का असर क्या कहें,
शराब से ज़्यादा तलब तेरी आँखें बन गईं।
-) तेरी आँखें हैं या साक़ी की साजिश,
हर नज़र में घुलता गया नशा धीरे-धीरे।
-) तेरी आँखों से जो पी ली एक बार,
फिर न जाम भाया न कोई त्यौहार।
-) तेरी निगाहों का जादू कुछ ऐसा चला,
होश संभालते-संभालते उम्र निकल चली।
-) तेरी आँखों ने जो डाला असर,
अब शराब भी लगती है फीकी मगर।
-) तेरी नज़रों की धुन पे दिल ऐसा थिरका,
जैसे हर सांस ने रक्स करना सीख लिया।
-) तेरी आँखों का नशा जब से चढ़ा,
अब जाम भी खुद बेहोश लगता है।
-) तेरी आँखों के साए में जो आ गया,
फिर किसी और को चाह न सका।
-) तेरी निगाहों में डूबा जो एक बार,
फिर नशे की जरूरत न रही हर बार।
-) तेरी आँखों की शराब ने जो चखा,
फिर खुदा भी कहे — ये इश्क़ सच्चा।
-) तेरी आँखों से बंधी कुछ ऐसी डोर,
जो न टूटे न छूटे, बस खिंचती ही जाए।
-) तेरी आँखों की कशिश में जो डूबा,
फिर लौटना न चाहा उस जमीं से।
-) तेरी निगाहों में जो सुकून है,
वो मयखाने के हर जाम में नहीं।
-) तेरी आँखें जब बोलती हैं चुपचाप,
तो हर शायर बना देता है इश्क़ की किताब।
-) तेरी आँखों में जो चमक है,
वो किसी जाम की बात नहीं करती।
-) तेरी निगाहों का असर कुछ यूं हुआ,
मेरी कलम भी अब तेरी ग़ज़लें लिखती है।
-) तेरी आँखें नहीं, एक समंदर हैं नशे का,
उतरोगे तो डूबने से बच न पाओगे।
-) तेरी आँखों से जो किया पहला इश्क़,
आज तक कोई दूसरा नशा चढ़ा ही नहीं।
~~~आराध्यापरी~~~






























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