Beautiful love shayari in hindi -: "यहाँ पर आपको मिलेगी 'हिंदी बेस्ट शायरी', जो आपके दिल की भावनाओं को सुंदर शब्दों में पिरोकर एक नई पहचान देती है।"
-) इश्क़ तेरे मुकाम को पाना आसान नहीं,
भुलाएं हुएं को याद करके भूलना आसान नहीं ।।
हम सोचते थें एक कहानी ख़त्म हुईं,
उस कहानी को किताब के पन्नों से हटाना आसान नहीं ।।
-) जिसे हमनें सारी कुर्बत से मांगा ,
उसे किसी ने बस क्षणिक प्रयासों से पाया हैं।।
उसे देखने को आँखें तरस जाती थी कभी,
उसे किसी ने आईना बनाया हैं।।
-) ये वक़्त अब अठखेलियां खेल रहा हैं,
जिसका मिलना नसीब में ना था,
उन्हें आँखो के सामने ले आ रहा हैं ।।
अब ये हैं कि उसे रोकें,
और पूछें हाल कैसा हैं,
किसी और की सांसों की पनाह में महफूज़ हो क्या तुम ,
डर ये हैं कि उसे झूठ छिपाना नहीं आता,
और में उसे सीने से लगा नहीं सकता,
दर्द हैं इसके आगे क्या कहूं,
वो मेरी दुखती रगों का अब नमक हैं।।
-) वे किस की चाहत में थें,
इस क़दर भ्रम में थें।।
जो हैं सब वो केवल एक शख़्स हैं,
खुली आँखें थीं उनकी और वे क्या ख़ूब ख़्वाब में थें।।
तब ख़्वाब टूटा तो वे ख़ुद को समेट ना पाएं,
वे इस क़दर टूटें सात आसमान के टूटने जितने दर्द में थें।।
-) जिसका कभी हमनें सोचा नहीं,
वो आज सामने ही आ गएं।।
ढूंढा उन्हें हमनें दूर आसमानों तक ,
वो ज़मीन पर चलके आ गएं ।।
हम भ्रम जाल को तोड़ ना सकें कि ये सच हैं,
वे सब जंजालों को तोड़ आ गएं।।
-) आशुतोष अब वो पूछें कभी मेरा,
तो उनसे कहना बहुत याद किया हैं उसने तुम्हें।।
ख़ुदा का नाम लेते हैं अंतिम पड़ाव में सब ,
उसने केवल याद किया हैं तुम्हें ।।
-) वक़्त भी बड़ा अजीब हैं आशुतोष,
जब जिस की दरकार की वो मिला नहीं ।।
सोचा जो कभी के अब कुछ बचा नहीं ,
तो कुछ बचा हैं लेकिन हमें वो कभी मिला नहीं ।।
-) लोग शराब का सहारा हुएं ,
हम ये भी ना कर सकें ।।
नशें की लत में लोग तबाह हुएं ,
हम नशा भी ना कर सकें।।
टूटे दिल की मंज़िल कुछ तो हो सकती थीं,
हम उन मंजिलों के भीं ना हो सकें।।
हमसे बेहतर तो कोई ना था,
मगर हम बेहतरीन क्यों ना हो सकें।।
-) वो सामने आएं बैठें,
हम अपने होश को गवां बैठें ।।
जिनसे सब कहना था,
हम उनसे कुछ ना कह सकें ।।
-) यूं भीं ना आईए एक ज़माने के बाद,
बहुत कुछ बदल जाता हैं,
यादों को भुलाने के बाद ।।
बड़ी कश्मकश से भुलाया था तुमको,
अब फिरसे ना आईए,
पुराने ज़माने के साथ ।।
-) वो कोई मांगने की चीज़ ना थीं,
उसपे पूरा हक़ था मेरा ,
मैं क्यों मांगू उसे ,
उसे मुझे बग़ैर किसी बात के दिया जाना चाहिए था।।
-) ज़िंदादिली हमारी ख़ूब हैं,
जो अपना था उसे भीं दान कर आएं ।।
अपनी क़िस्मत को किसी और तराजू पर तौल आएं,
हम अपनी कहानी बस अंजान रास्तें पर छोड़ आएं ।।
-) महफूज़ हैं मेरी बाहों के घेरें ,
किसी और की बाँह नापना ,
सजाएं मौत से कम नहीं ,
मेरी अदालत में बेवफ़ाई का कानून मौत हैं।।
-) उसे देखना देखकर आँखें भरना ,
दस्तूर बुरा हैं ये ,
उसका सहम जाना ,
फ़िर मुझे वापिस देख कर ख़ुश हो जाना ,
बड़ा अजीब हैं ये ।।
ये बात नहीं कि वो साथ नहीं मेरे,
मेरे होनें से ख़ुश हो जाती वो ,
काफ़ी हैं ये ।।
~~~आशुतोष दांगी~~~
-) रिश्तों की आड़ में जहर पिलाते हैं,
मुँह पे मुस्कान, दिल में जलाते हैं।
-) खून का रिश्ता कहकर जो दिल दुखाते हैं,
वो गैरों से बदतर नज़र आते हैं।
-) नाम रिश्ते का, काम सौदा करते हैं,
हर एहसान को तौल में धरते हैं।
-) बड़े फख्र से कहते हैं "हम अपने हैं",
पर ज़रूरत में अक्सर सपने हैं।
-) रिश्तेदारों का क्या कहें जनाब,
चेहरे पे मिठास, पीठ पे खुराफात।
-) कंधे से कंधा मिलाने की बात करते हैं,
मौका मिले तो पीठ में छुरा भी धरते हैं।
-) काग़ज़ों पे रिश्ते बना लेते हैं लोग,
पर दिलों से हमेशा खाली होते हैं लोग।
-) रिश्तों की तिजोरी में नकली सिक्के पाए,
जो चमके भी, तो सिर्फ मतलब में आए।
-) बेरहम वो नहीं जो दूर होते हैं,
बेरहम वो हैं जो पास रह के भी गैर होते हैं।
-) माथे पे चिंता, पर दिल में चाल है,
रिश्तेदारों की भी क्या कमाल चाल है।
-) साथ देने का वादा, पर मतलब से प्यारा,
ऐसे रिश्तेदारों का रिश्ता ही सारा।
-) खुशियों में आकर गले लगाते हैं,
ग़म में पहचान तक भूल जाते हैं।
-) कभी घर के दीये थे, अब अंधेरों के कारण,
बेरहम रिश्तेदार हैं, सबसे भारी भारण।
-) जुबां पर रिश्तेदारी, दिल में जलन की आग,
कैसे कहें इन्हें अपनों का भाग?
-) कभी मदद माँगो तो समय नहीं होता,
अपना फायदा हो तो चैन नहीं होता।
-) दिखावे की मिठास में छुपा ज़हर है,
रिश्तेदारों का आजकल यही बहर है।
-) भरोसा किया तो टूट गया दिल,
रिश्तेदार निकले सिर्फ़ फरेब में माहिर।
-) जिन्हें अपना समझा, वही चोट दे गए,
रिश्तेदारी के नाम पर धोखे दे गए।
-) हर मुस्कान में चालाकी की झलक है,
इन रिश्तेदारों की पहचान अब पक्की है।
-) मतलब से रिश्ते निभाते हैं लोग,
दिल से चाहो तो बन जाते हैं रोग।
-) दिल से कभी जो रिश्तों को देखा,
हर चेहरा निकला बस मुखौटा लेखा।
-) जो नज़रों में अच्छे, वो दिल में नहीं,
बेरहम रिश्तेदारों की ये ही तो कमी।
-) दुनिया में दर्द अपनों से ही मिलता है,
रिश्तेदार नाम का ज़ख्म पलता है।
-) बचपन की मिठास अब खटास बन गई,
रिश्तेदारों की सोच अब नफरत बन गई।
कभी कंधा थे, अब बोझ बन गए,
बेरहम रिश्तेदार, क्यों इस कदर बदल गए?
~~~आराध्यापरी~~~
-) कुछ हुआ ही नहीं हासिल जाने इतनी उल्फ़तें क्यों कर बैठा हूं मैं ।।
प्यार के इस प्यारे मौसम में दिल तोड़ बैठा हूं मैं।।
मुझसे बातें ना कर ग़ैर की ,
अपने ही किसी से उलझ बैठा हूं मैं।।
-) माना कि हम इस दौर में नएं हैं,
मगर तैयारी पूरी कर आएं हैं ।।
सुना हैं नौसिखियें गलती कर बैठते हैं,
मग़र हम वैसे भी तो नहीं ,
तजुर्बे दारों के तज़ुर्बे से बेहतर हैं।।
-) वक़्त भी हमारा ना रहा ,
उस बेचारें को भी क्या दोष दें ।।
उसने अपनी आख़िरी हद तक कोशिश आजमाई,
उसे कैसे बुरें वक्त में रहने दें ।।
-) माना कि सबकुछ हासिल हैं,
उसके बग़ैर सब का क्या करेंगे ।।
उसके ना हो सके तो कैसी रहेगी जिंदगी ,
उसके बग़ैर मौत भी मौत ना रहेगी ।।
-) उसकी हिफाज़त फ़र्ज़ मेरा हैं,
मेरे बग़ैर मेरे जैसा कौन उसे देखता हैं ।।
सब उसे बुरी नज़र से देखतें हैं,
सबकी नज़रों से उसे छुपाने का फर्ज़ मेरा हैं।।
-) अब तो अपने किरदार से ,
जाने क्या झलकनें लगा हैं।।
जिस बात से उलझें हैं,
उसी में बस ख़ैर उलझनें लगा हूं,
अब तो पतन के रास्तें बस चलने लगा हूं ।।
-) इस उम्मीद पे हम आएं थें,
की कहीं तो सुकून की तलाश में आ बैठें ।।
मग़र निराश मुझको ,
तलाश ख़त्म ना करने का श्राप लग बैठा ।।
-) कहीं दूर इस ज़माने से परेह ,
एक आशियाना हमारा होगा ।।
उसपे किसी का कोई हक़ ना होगा,
जो होगा हमारा होगा ,
किसी और का कुछ ना होगा ।।
-) लगने लगा हैं अब कहीं रह गुज़र जाएं ,
अपने हक़ से ही दूर हो जाएं ।।
किसी की शौहरत पहले भी ना मंज़ूर थीं,
अब अपनी ही दौलत पे इतराने लग जाएं ।।
-) ये दौर बचपन गुज़र गया ,
अब ना जाने कैसे दौर में आ गएं ।।
गलतियों का सबब पहले मज़ाक था ,
अब पैग़ाम सजाएं मौत हैं ।।
-) हम अपनी करते रहें ,
औरों की मर्ज़ी से ना चलने की कसम खाते रहें ।।
हुआ ये कि फ़िर,
हम ख़ुद के क़रीब रहें ,
बाक़ी दूर जातें रहें ।।
-) मैं किसी का हुआ ही नहीं,
अपने पहले वाले अंदाज़ को भूला ही नहीं ।।
नज़र अंदाज़ करता रहा पहले ख़ुदको,
जब पानी सिर चढ़ा तो ,
खुदमें ख़ुद को पाया ही नहीं ।।
जब लगा कि अब आ जाएं उसी दौर में,
तो देखा कि किसी को करीब पाया ही नहीं ।।
-) मैं सब तबाह कर बैठा ,
किसी और से क्या उम्मीद करता ।।
अपनी हस्ती को मिटाकर,
नईं पहेली से ख़ुद को बनाने बैठा,
ना उम्मीद मिली ना मैं पहले जैसा ,
बस में तन्हा रह गया ,
इसी ग़म को साहिल कर बैठा ।।
-) दूर कहीं आसमानों में,
उसका चेहरा नज़र आता हैं ।।
वो होती जो क़रीब तो ,
मेरा मन शांत सा रहने लगता हैं।।
मैंने ख़ुद को मिटाया हैं,
क्रोधाग्नि में जो दिख जाएं वो तो सब शीतल हो जाता हैं।।
-) ख़ून के रिश्ते भी क्या ख़ूब हैं,
बग़ैर किसी रिश्ते के निभाएं जाते हैं ।।
जो दिल से बन जाएं उन रिश्तों को ,
किनारे पर बैठाएं जाते हैं।।
की समंदर में फिर भी गहराई कम हैं,
इन ख़ून के रिश्तों को समन्दर की दूर गहराइयों से भुनाए जाते हैं,
कांच के खिलौनों से शीश महल बनाएं जाते हैं।।
~~~आशुतोष दांगी~~~






























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