Romantic love shayari for boyfriend -:"यहां आपको मिलेगी हिंदी बेस्ट शायरी की बेहतरीन कलेक्शन, जो आपकी भावनाओं को एक नई पहचान देती है और दिल से दिल तक पहुंचती है।”
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-) देर से आने वालें,
ये इतना और एहसान कर ।।
की आ ही ना अब ,
शिक़ायत हम ये कर लेंगे कि मिलने कि तुझे थीं ही नहीं ।।
देर से आने पर ये कहकर बच निकलता हैं तू
की मैं आया तो हूं,
अब तेरी इन ना समझ सी चालाकी को दूर कर ।।
-) याद बन गएं थे जो कभी ,
अब हक़ीक़त में नज़र आने लगें ।।
हम सोचतें थें कि दूर निकल गएं वे अब आ ना सकेंगे,
मग़र वे दूर उलफ़तोँ से लौट आने लगें ।।
-) हक़ीक़त से वाक़िफ नहीं ये ज़माने भर के लोग,
एक हँसी के पीछे बस एक चेहरा नहीं होता ।।
हसीनों ने ज़रा सा मुस्कुराकर चैन लाखों के छीनें हैं,
हर कोई साफ दिल नहीं होता ।।
-) कुछ तो ग़लत हुआ हैं,
उस एक शख़्स के साथ ,
यूं ही क़लम बेवफ़ाई लिखना पसंद नहीं करती ।।
-) बदनामियों के डर से प्यार करना छोड़ दो,
अगर प्यार हैं तो नाम बदनाम लाज़मी हैं।।
छुपते छुपाते मिलते हैं लोग ,
खुलें मैदान की सैर करना अभी खुदकुशी की आरज़ू हैं।।
-) हम बदनसीबों से मुकद्दर वाले यूं ना बात किया करो,
हम जिसको बड़ी मन्नतों से मांगते हैं ,
वह हासिल तुमको क्षणिक पलों में हैं।।
-) आज दिल ही ना टूटा बहुत कुछ हो गया ,
ऐसा लगा आसमान ज़मीन दोनों किसी इंसान को निग़ल गएं।।
हम नम आँखो से उसे तलाशते रह गएं,
वो सब बातें छोड़ बस विलुप्त हो गएं।।
-) ये उम्मीद भी नहीं के वो वापिस आएगा ,
दूर आसमानों से वास्ता हैं उसका अब ।।
मैं चाह कर भीं कुछ नहीं कर सकता ,
मेरी अनिश्चितताओं की निश्चितता हैं वो अब ।।
-) आसमां कभी नूर बरसाता हैं,
कभी तेज़ाब सा रूठ जाता हैं।।
कभी फसलों को हरी भरी कर जाता हैं,
कभी जलमग्न पृथ्वी कर जाता हैं।।
रहमत अजीब सी हैं इसके मन की ,
कभी दोस्त कभी दुश्मन बन जाता हैं।।
-) नदियों ने रास्ता क्या बदला ,
लोगों ने जाना कि ये मैदान छोड़ देती हैं।।
नये रास्ते बना देना किसी और के बस की बात नहीं हैं,
जन्मों का तजुर्बा मन की शांति और ना जाने क्या लाना होता हैं।।
-) अब नाम बदनाम हो गया ,
कुछ जो कमाया था वो भीं कोई और ले गया ।।
कुछ ना हासिल हुआ पुराना सब चला गया,
एक दोस्त था वर्षों से साथ मेरे ,
वक्त ने खेल क्या खेला,
वो भीं ख़ुदा को प्यारा हो गया ।।
रहमों करम की भीख मांगी जो ख़ुदा से,
तो अंधेरे में कहीं चिराग़ जल ही गया ,
मांगा ज़्यादा कुछ नहीं ,
हमें कबूलनामें में आशुतोष मिल गया ।।
-) रातों की नींद से अब दोस्तों नहीं,
हमनें चांद का दीदार कर लिया ,
बस उसकी चांदनी में खोएं हुएं रहतें हैं।।
-) इस बात से इनकार ना करना ,
की हम तेरे नहीं हैं ।।
अगर ये सच ना हुआ तो ,
हम किसी के नहीं हैं ।।
हम दुआओं को क़बूल हैं,
और दुआ हम हैं तो नहीं तो फ़िर हम नहीं हैं।।
-) बातें असमंजस में होने लगीं ,
सुनकर आँखें भर आने लगीं ।।
हमारे ऊपर इल्ज़ामात भी तमाम हैं,
बातें जब उनने हमारे विरोध में करी तो,
हमारी जान ना गईं बस आ तन बदन में लगने लगीं।।
-) तेरा इश्क़ मंज़िल हैं मेरी ,
इसके आगे और कुछ ना चाहता है मेरी ।।
~~~आशुतोष दांगी~~~
-) मैं कौन हूँ, ये सवाल हर शाम पूछता हूँ,
आईने में खुद से रोज़ नाम पूछता हूँ।
-) चलती हवाओं से पूछ बैठा मैं कौन हूँ,
ख़ामोशी ने मुस्कुरा कर कहा—"ख़ुद का जुनून हूँ।"
-) नाम मेरा कई हैं, चेहरा एक भी नहीं,
मैं वो सवाल हूँ जिसका जवाब तकदीर भी नहीं।
-) रिश्तों की भीड़ में अक्सर खो जाता हूँ,
ख़ुद से मिलने को ही हर रोज़ लौट आता हूँ।
-) मैं परछाईं हूँ या कोई अधूरी कहानी,
हर मोड़ पे ढूँढी है मैंने अपनी निशानी।
-) सन्नाटों में भी मुझसे बातें करता हूँ,
मैं कौन हूँ, अब भी खुद से डरता हूँ।
-) हर लम्हा एक नया सवाल बना,
मैं कौन हूँ—इसका कोई हाल बना?
-) कभी किताबों में, कभी ख्यालों में बसा,
मैं एक अधूरा सफर, ना कोई रास्ता।
-) जब भी सोचा खुद को, एक साया निकला,
मैं कोई शख्स नहीं, बस एहसास निकला।
-) हर चेहरा मेरा, हर बात मेरी,
फिर भी क्यों लगती ज़िन्दगी अधूरी?
-) मैं पत्थर नहीं, ना ही कोई रौशनी,
मैं तो बस एक चलती हुई खामोशी।
-) खोज में निकला तो सवाल बन गया,
मैं कौन हूँ, ये ख्याल बन गया।
-) मेरा नाम भी मुझसे अनजान है,
कौन हूँ मैं—ये सवाल हर शाम है।
-) खुद से मिलना भी जैसे मंज़िल है कोई,
मैं हूँ कौन—ये भी मुश्किल है कोई।
-) हर चेहरे में खुद को टटोलता हूँ,
मैं कोई नहीं, बस खुद को बोलता हूँ।
-) आईना भी अब जवाब नहीं देता,
मैं कौन हूँ—ये सवाल क्यों नहीं सुलझता?
-) चुपचाप हूँ, मगर शोर हूँ अंदर,
मैं कौन हूँ—ये जंग है अक्सर।
-) ज़िन्दगी ने कई नाम दिए,
पर मैं अब भी बिना पहचान जिए।
-) ना कोई नाम, ना कोई पता,
मैं बस एक सोच हूँ—रहा।
-) जब भी खुद को टटोला, खाली पाया,
मैं कौन हूँ—ये सवाल भारी पाया।
-) ना मैं कल था, ना मैं आज हूँ,
मैं बस एक सवाल सा राज हूँ।
-) मैं धड़कन हूँ या कोई साज हूँ,
खुद में ही उलझा एक ताज हूँ।
-) मेरे अंदर कई लोग रहते हैं,
मैं कौन हूँ—ये वो भी कहते हैं।
-) ख्वाबों में ढूँढा, यादों में छुपा,
मैं कौन हूँ—हर जगह खुद को टटोलता।
-) खुद से खुद की पहचान छुपी है,
मैं कौन हूँ—ये बात कहीं रुकी है।
~~~आराध्यापरी~~~
-) पत्तों की आहट से यूं ना ख़ौफ खाइए ,
फिज़ा हमारे नाम से इनको आहट भेज देती हैं ।।
मेरे होनें का अहसास दे देती हैं,
मेरे नाम के नग़्में छेड़ देती हैं ।।
-) दिल लगाएं बैठें हैं,
जाने कैसे बैठें हैं ।।
और तो कुछ हासिल नहीं ,
तेरे आने की उम्मीद जगाएं बैठें हैं ।।
-) मैं रास्तों का रहा हूं ,
मंज़िल का ठिकाना हीं नहीं ।।
इन रास्तों ने मुझको पाया हैं,
मंज़िलो को कहां मेरी जरूरत हैं।।
-) उसके हर एक वादें को अपना जान बैठें हैं,
हम उसे अपना सबकुछ मान बैठें हैं।।
उसे पल भर की ख़बर नहीं ,
हम उसपे सारी ज़िंदगी कुर्बान कर बैठें हैं ।।
-) मैं शर्द हवाओं से कतराता रहा हमेशा ,
इनकी मौजूदगी मुझे मंज़ूर ना थी ।।
जब इन्होंने मुझे आजमाया ,
तो जाना मैंने की सुकून बस इनके साथ में हैं।।
-) हमें हमारी परवाह नहीं ,
अब जो हैं उससे क्या उम्मीद करें ।।
रंजो ग़म की बारिश हैं,
मेरे हाथ में दुर्भाग्य की रेखाएं हैं।।
-) आशुतोष सा हाल हैं,
की हम बेहाल हैं।।
सारे ज़माने से अंजान हैं,
किसी की दोस्ती मंज़ूर नहीं ,
हम अकेले ही कमाल हैं ।।
-) उनसे दिल लगा के ,
चैन तो दिल को आता नहीं ,
रातों की नींद का पता नहीं ,
दिन के सुकून का पता नहीं ,
उनसे बात ना हो तो मेरे होश की भी खबर नहीं ।।
-) हम ये क्या हो गएं,
मिलने कि आस में बिछड़ गएं ।।
बातें अभी शुरू हुईं थी ,
की बातें सब तबाह हो गईं ।।
हमारी कहानी शुरू होने से पहले ही ,
ख़त्म हो गईं की किस्मत हमारी बर्बाद हो गईं ।।
-) कभी याद आ जाऊं मैं तो सोचना जरूर ,
एक तेरे लिए अपनी जान को कुर्बान कर देता था ।।
ये आज कल के आशिक़ हैं,
पहले ख़ुद को याद रखते हैं,
बाद में तेरा ख़्याल करते हैं ।।
-) तू हमारी ज़िंदगी की सबसे अहम साझेदारी हैं ,
उस से भी दूर हमारी कहानी हैं।।
तुझे किसी को बता भी नहीं सकते ,
हमारे दिल के क़ैद खाने से आजाद कर भी नहीं सकते ।।
-) एक दूर वो अपने घर से ,
मैं दूर हूं इस जहां से ।।
उसकी ख़बर सबको हैं,
मैं ज़माने से अंजाना हूं ।।
-) मैं तुझे ख़ुदा की दहलीज से चुरा लाऊंगा,
जो ना मिला तू तो में ख़ुद को ,
मौत से गले लगा आऊंगा ।।
-) जीते जी इश्क़ की मुराद ना पूरी हो ,
तो जन्नत की ख़बर रखना ,
हमको मौत का पैग़ाम लिखना ।।
-) तेरे बाद वजूद तो नहीं मेरा ,
इश्क़ होगा इसके सिवा हासिल नहीं कुछ हमको ।।
मोहब्बत का पैग़ाम लिख आएंगे तुझे ,
ज़िंदगी कि परवाह नहीं हमको ।।
~~~आशुतोष दांगी~~~
-) आराध्या में तुम, तुम में बसते अरमान हो,
मंदिर की मूरत नहीं, दिल का भगवान हो।
-) हर सांस में तेरा नाम समा गया है,
तू ही पूजा, तू ही खुदा बन गया है।
-) आंखें बंद करूं तो तेरा चेहरा दिखे,
इबादत का रंग अब तुझमें ही दिखे।
-) तू ही धड़कन, तू ही साज है,
मेरे आराध्य की तू आवाज़ है।
-) तेरे बिना अब कुछ भी अधूरा लगे,
हर दुआ में बस तेरा ही नाम जगे।
-) इश्क़ की राह में तुझसे मुलाकात हुई,
जैसे आरती में घंटियों की बात हुई।
-) तू शब्दों से नहीं, एहसासों से जुड़ा है,
हर पल मेरी रूह में गहराई से गूड़ा है।
-) पूजा में दिया, तू आरती की लौ है,
तू ही मेरा इश्क़, तू ही मेरी मौ है।
-) ना मंदिर, ना मस्जिद, ना कोई मजार है,
तू है तो हर जगह मेरा त्यौहार है।
-) तेरे नाम से दिन की शुरुआत होती है,
जैसे मंदिर में सुबह की आरती होती है।
-) तू ही पूजा, तू ही प्रसाद है,
तेरे बिना सब कुछ बेरंग साद है।
-) तेरे होने से ही सजी है ये दुनिया,
तू ना हो तो लगे सब कुछ है सुनिया।
-) मेरी बंदगी का तू एकमात्र मर्म है,
हर धड़कन में तेरा ही धर्म है।
-) तुझमें ही खुदा को देखा है मैंने,
तेरे बिना कोई और ना देखा है मैंने।
-) तेरे आने से महक उठा जीवन मेरा,
जैसे फूलों से भर गया वीराना सारा।
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-) तू मेरी आंखों में सपना नहीं,
परम सत्य है, कोई छलना नहीं।
-) तुझमें छुपी है मेरी सारी प्रार्थना,
तू ही मेरा कर्म, तू ही आराधना।
-) तेरा नाम जपूं तो दिल को सुकून मिले,
जैसे सूखी रूह को बारिश की बूंद मिले।
-) तू ही मेरा शिव, तू ही शक्ति,
तेरे बिना जीवन लगे है रिक्ति।
-) तेरे बिना हर पल अधूरा सा लगे,
जैसे मंदिर बिना घंटी सूना सा लगे।
-) तेरे बिना कोई सवेरा नहीं,
तू बिन मेरे जीवन में बसेरा नहीं।
-) तेरे आने से हर पल है रोशन,
तू ही मेरी पूजा, तू ही आराधन।
-) तू मिल जाए तो सब कुछ मिल जाए,
जैसे मूरत में भगवान मिल जाए।
-) ना मंदिर की घंटी, ना आरती की बात,
तेरे होंठों की हंसी ही मेरी सौगात।
-) तू ही मेरा ध्यान, तू ही मेरा धाम,
तेरे होने से जुड़ा हर एक काम।
~~~आराध्यापरी~~~






























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