किसी को अपनी पहली मोहब्बत याद आती है, किसी को बिछड़ा हुआ दोस्त, किसी को परिवार की याद और किसी को अपने संघर्षों की तस्वीर दिखाई देती है। यही वजह है कि हमारी शायरियाँ सीधे दिल तक पहुँचती हैं।
हर पाठक हमारे लिए खास है। जब कोई व्यक्ति हमारी किसी शायरी को पढ़कर मुस्कुराता है, भावुक होता है या अपने जीवन से जुड़ा हुआ महसूस करता है, तो हमारा प्रयास सफल हो जाता है।
हम मानते हैं कि शायरी लेखक की नहीं रहती; वह उस हर व्यक्ति की हो जाती है जो उसे अपने दिल से पढ़ता है।
-) हम जैसा अगर आंखों में आंसु लाने लग जाएं ,
कोई और बात बनाने लग जाएं ,
तो समझना गहरे ज़ख्म आ गए हैं दिल पर ।।
-) वक्त संभलने का मौका भी नहीं देता,
जिसे चाहते रहे ताउम्र उसकी एक झलक भी नहीं देता ।।
-) मेरे अच्छे होने को जानते हैं बस दो लोग,
एक आईने में छुपा वो शख़्स,
दूजा मेरा यार सनम ।।
मैंने आईना देखना बंद कर दिया ,
दूजे ने मुझसे मिलना छोड़ दिया ।।
अब जो बचा वो केवल बुरा हूं मैं ।।
-) मेरी मोहब्बत को बस परिंदों ने जाना हैं ,
कैद को पार करना कैसे ये बस उन ने जाना हैं।।
वे भी कभी आजाद ना हो सके ,
मैंने खुद हमेशा क़ैद ही माना ।।
-) दायरे में रहकर इश्क़ करना इतना आसान नहीं ,
ना जाने कितनी बातों पर मन मारना पड़ता हैं।।
मिलने कि चाहता हो फिर भी अकेले घुटना होता हैं,
जमाने से ग़म छुपाना और मुस्कुराता चेहरा दिखाना पड़ता हैं।।
-) इश्क़ हद से ज्यादा जो हो जाएं तो सजा ही समझो,
या तो उस से बढ़ चलो या उसकी सुनते रहो ।।
वो जो कह दे कुछ ग़लत तो उसको भी सही समझो,
वो रात को दिन और दिन को रात तो वो ही समझो।।
-) शक्ल में क्या क्या राज़ छुपने लगे हैं,
अपनों से बात छुपने लगे हैं,
एक नक्श हैं मेरे बयान में ,
उसे बदलने लगे हैं ,
ग़ैर समझने लगे हैं बेअदबी पेश करने लगे हैं।।
-) अब तो वो भी दूर होने लगे हैं,
जो सबसे क़रीब थे कभी ।।
हमसे ख़ुद को अलग करने लगे हैं,
जो हम में थे कभी ।।
लगे यूं के अब समझदार होने लगे हैं,
जो नासमझ थे कभी ।।
-) उनकी अक्ल जाने कैसे ख़त्म हुईं,
ज़माने से अक्लमंद थे जो कभी ।
उनकी बातों पे फ़ूल झड़ते थे कभी ,
आज कांटों सी बरसात हो रही हैं।।
-) ये दलीलें यूं पेश ना कर ,
मैं सच से रुबरु ख़ास हूं ।।
मैं अनदेखा कर देता हूं ,
तेरे सच से बाकीफ़ आज भी हूं ।।
समझते हैं वे के कुछ खास नहीं हैं,
मगर मैं सच में बहुत ख़ास हूं ।।
-) मोहब्बत की गली में ना आना आशुतोष ,
यहां बेवफ़ाई रुसवाई के सिवा कुछ भी नहीं ।।
दिल लगाने वालों के दिल में ,
गिले सिकवे तमाम हैं, मगर प्यार नहीं।।
जी करता हैं तेरा दिल दुखाने वालों को,
एक आग में झोंक आऊं मगर उसके बाद ,
तेरे होश हवास का पता नहीं ।।
-) जो इजाज़त दे आशुतोष तू तो ,
दिल की बस्ती क्या बेवफाओं के शहर में आग लगा दूं।।
मुमकिन क्या नहीं फिर ,
इनसबका नामों निशान मिटा दूं ।।
-) उसके और मेरे रिश्ते को ना जाने क्या नाम दिया गया ,
मुझे तो केवल बेवफ़ा बुलाया गया ,
दिल तोड़ा गया नक़ाब में पेश किया गया ,
जो कुछ होती इजाज़त बताने कि,
तू जुबान पे ताला लगाया गया ,
बेगुनाह को गुनहगार ठहरा दिया गया ,
उनके दिल से निकाल दिया गया ,
मुझे बर्बादी के आख़िरी मुकाम पे छोड़ा गया ।।
-) मैंने ख़ुद से वादों की एक आस रखी,
ख़ुदने ही उसे तोड़ रखी ,
मंजूर ना थी जुदाई मुझे ,
उसने ऐसी बात रखी मुझे मेरी ख़ुदाई छोड़नी पड़ी ।।
-) ऐ ख़ुदा अबके दिलदार झूठा ना देना,
दिल लगाना मगर मुझे धोखेबाज ना देना ।।
चाहे जान ले लेना ,
लेकिन जान से प्यारा ना देना ।।
"हमारी वेबसाइट पर प्रस्तुत hindi best shayari का संग्रह उन भावनाओं को आवाज़ देता है, जिन्हें शब्दों में ढालना मुश्किल होता है — चाहे वो मोहब्बत हो, जुदाई हो या ज़िंदगी की कोई गहरी बात।”
-) कोई और इतनी अदब से पेश नहीं आया उससे ,
मैंने उसे खुदा से कम नहीं समझा ,
उसे इतना सब रास नहीं आया ,
वो अच्छी बातों को सब बुरें में लें गया ।।
-) हमसे आबों अदब से पेश आइएं,
हम वो नहीं जो दिखतें हैं,
ये नौजवान नज़र आतें हैं,
ये सब मेरी हीं गिरफ्त के शिकारी हैं ।।
-) माना कि शहर तेरा हैं,
जानते लोग मुझें भीं यहां ख़ूब हैं ,
तू जो औरों के आगे सिर झुकाता रहता हैं,
ये शामों सुबह मेरा नाम रटते रहते हैं ।।
-) तूने कब हमें अपना समझा ,
जब भीं हमने बात की गैरों सा लगा ।।
हमनें फ़िर भीं तुझे अपना समझा ,
अब जो इधर उधर की बातें करता हैं तू ,
एक दफा हमसे खुलकर बोल,
अगर ये तेरे पैरों में गिरकर मुआफी ना मांगने लगे तो हम ये शहर छोड़ देंगे ।।
-) आजकल के लड़के ,
किस के सामने पंखों को फ़ैला रहें हैं ,
हम वो हैं जिसने इस शहर पर राज़ किया हैं,
ये आजकल की पैदाइश हमें उड़ने का हुनर सीखा रहीं ।।
-) उम्मीद ना हो तो क्या कीजिए ,
ख़ुद को हौसला दीजिए ,
हो सके तो काम करिएं ,
वरना ऊपर वाले के हाथों सब छोड़ दीजिए ।।
-) हम दर्द कों बयां शब्दों से भीं ख़ूब कर लेतें हैं,
हमसे कोई कुछ पूछें तो एक दो नज़्म पास लेते हैं ।।
-) हाल ना पूछ इस बदहाल शहर का ,
यहां की फिज़ा जहर के सिवा कुछ नहीं उगलती हैं ।।
-) एक कहानी लिख दी जाएं मेरे नाम ,
नायक हीं लिखना किरदार को मेरे ,
माना खलनायक हूं असल ज़िन्दगी में मैं ,
मगर ज़माना भीं तो ख़राब हैं ,
फ़िर बताओ क्या बुराई है नायक लिखने में मुझे ।।
-) मैंने तेरा नाम लिखा वो प्यार लिखा गया ,
ये जादू से कम तो नहीं ,
मैंने ख़ुद को आईने में घुरा ,
तेरी तस्वीर आईने में आ गईं ।।
-) प्यार बेशक कीजिए किसी से ,
मगर अपनी अना को ना भूलाइएं ,
जब बात अना पर आने लगें तो प्यार को भूल जाइएं ।।
-) तेरे बाद हम पहले जैसे तो नहीं रहेंगे ,
रहेंगे कुछ और मगर ऐसे तो नहीं रहेंगे ।।
जो हुआ ठीक हैं वो ,
हमपर जो गुजरी किसी और से कुछ ना कहेंगे ।।
-) माना कि वो ख़ूबसूरत हैं,
इसका मतलब ये तो नहीं फूलों का मजाक बनाया जाएं ,
ये फूल लग जाएं बालों में उसके तो चार चांद उसकी ख़ूबसूरती में लग जाते हैं ।।
-) एक रोज़ बाग़ में टहल रहा था मैं,
बात ये पुष्पों ने छेड़ दी ,
हमें किसी के पैरों में ना बिछाना आशुतोष,
ये बात हमारी शान के ख़िलाफ़ हैं,
हो भारत के वीर सपूत तो सोच लेंगे कुछ हम,
मगर ऐसे हर किसी के लिए ये नाटक मत कर जाना ।।
-) तेरे बाद दिल लग नहीं सकता ,
बिछड़ने की बातें करता तो हैं मगर बिछड़ नहीं सकता,
हम भी क्या करेंगे बिछड़ कर तुझसे ,
अपनी जान दे देंगे और मैं जी तो नहीं सकता ।।
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-) तेरे इश्क़ में हम शायर बन गए ,
वरना इतना कुछ हमारे बाद की बात नहीं ।।
-) हम इस उम्मीद में ज़िंदा हैं कि वो आयेंगे एक दिन,
मगर सच ये हैं की वो कभी लौटेंगे नहीं ।।
-) हम किस से कहें क्या हुआ ,
जो हुआ वो बातें बताने लायक़ नहीं हैं ,
फ़िर भीं ये उम्मीद हैं,
भविष्य की नौका डगमगाएगी तो नहीं ।।
-) ना कर बात ऐसी जिस से हमारा दिल दुखने लग जाएं,
औरों की बातों पर दिल गौर करनें लग जाएं ।।
-) हम अपनी आन मिटाना तो चाहतें नहीं ,
मग़र अपनी आन से ज़्यादा ज़रूरी कुछ और बातें भीं थीं ।।
-) उम्मीद का दामन थामा तो हैं
इतनी जल्दी कस्ती हमारी डूबेगी भीं तो नहीं ।।
-) छेड़ कोई ऐसी धुन,
जिसे सुनकर हम झूमती फिज़ाओं से हो जाएं ,
खुलें आसमान में परिंदों से हो जाएं ।।
-) कोई नहीं हमारे बाद हमारे जैसा ,
हमसे थोड़ा ऐसे पेश आइएं जैसे ,
हमारा सफ़र आख़िरी हो ।।
-) ज़िंदगी की दौड़ में ना जाने कितने पीछे रह गएं हम ,
हमारे साथ के सब ना जाने कहां दौड़ गएं ।।
-) वो बारिश का मौसम पसंद करने वाले,
हम उनको पसंद करने वालें ,
वो महकती फिज़ा से लहलहाने वालें ,
हम जान को फिज़ा बुलाने वाले ।।
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~~ आशुतोष दांगी
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