*“कुछ रिश्ते वक्त के साथ दूर हो जाते हैं, पर उनकी यादें हमेशा पास रहती हैं।”*
जुदाई का दर्द इंसान को भीतर तक तोड़ देता है। ऐसे समय में शायरी दिल का सहारा बन जाती है और इंसान को यह एहसास दिलाती है कि उसकी भावनाएँ अकेली नहीं हैं। ज़िंदगी में दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो बिना किसी स्वार्थ के दिलों को जोड़ता है।
सच्चा दोस्त खुशी में साथ हँसता है और दुख में कंधा बनकर खड़ा रहता है। हमारी दोस्ती शायरियों में इसी रिश्ते की गर्माहट और अपनापन झलकता है।
दोस्तों के लिए लिखी गई शायरियाँ केवल शब्द नहीं होतीं, बल्कि उन यादों का संग्रह होती हैं जो जिंदगी को खूबसूरत बनाती हैं।
-) मेरे दिल का हाल पूछना कोई खता तो नहीं,
और चाहा तूने भी मुझे हैं,
जिसका ख़ुद कुछ पता नहीं हैं।।
-) हमारे दिल से ना खेल इसमें जज़्बात नहीं ,
यूं महफ़िल में हमारा नाम ना ले ,
हमारे शब्दों में अब मिठास नहीं ।।
-) हम तो ना आते इन गुमनाम गलियों ,
तेरे होने की आहट हमें खींच ही लाईं,
इन बदनाम गलियों में ।।
-) जहां दिल को रोका वहां निगाहों ने बगावत कि ठानी,
और जहां निगाहों ने रोका वहां फिर दिल ने ठहरना बगावत समझा ।।
-) बस अब दिल ठहरना चाहता हैं,
बहुत भटक लिया अब तेरा होना चाहता हैं,
आशियाना चाहता हैं,
एक डाल का पंछी होना चाहता हैं,
ये अपना घर चाहता हैं।।
-) मेरे मशहूर होने से भी इल्म है जमाने को ,
हर किसी को मेरा कामयाब होना अखरता हैं,
रातों का सफ़र कैसा काटा मैंने,
उन्हें बस दोपहर का सूरज दिखता हैं।।
-) हर एक चांद को चांदनी नसीब नहीं ,
सच के देवताओं को इंसाफ नहीं ,
बागियों को बगावत नहीं ,
पंडितों को भगवान नहीं ,
ईमानदारों को ईमान नहीं ।।
-) हम आशिक़ मिज़ाज कहां दिल लगाने से डरते हैं,
हो जाएं खता फ़िर उसके अंजाम को सिर रखते हैं,
हम परवाने बस मिटने को आतुर रहते हैं,
आग की चाहत में लपटों से मिलते हैं ।।
-) हो मंज़ूर ख़ुदा को अगर तो दिल लगा ले हम ,
सारे फ़ैसले हो हमारे ही हक़ में तो कचहरी में ये मुद्दा भी उठा ले हम ,
हमें मंज़ूर नहीं अपने सिर पर इल्ज़ामात ,
इल्जामों से परे अपनी छवि बना ले हम ।।
-) तुमसे दिल लगाना ना जाने कितनी आफ़तों कि पुड़िया हैं ,
ये गुनाह हैं और मैं अब गुनहगार हूं ,
ऐसा फैसला मेरे हक़ में कर दिया हैं।।
-) आ भी जा के अब ज़िंदगी बागडोर कम लगे हैं,
पास तू ना हो तो सांसे कम लगे हैं,
कोई वादा मिलन का कर ,
बगैर वादें के सब झूठ सा लगे हैं।।
-) बिछड़ने वाले ये भी सोच की मिलने में कितनी ज़ुस्तज़ु थी ,
आफत थी बदनामिया थी मुसीबतों कि मारी किस्मत थी ,
जुदा होने में एक पल लगता हैं,
मिलने में सारी उम्र सी लगती हैं, ।।
खैर इसमें दोष किसी का भी ना तेरा ना मेरा ,
जमाने कि नज़र थी और बुरी नजर लगती हैं ।।
-) कुछ वादा ऐसा भी था ,
मेरे ना आने का था ,
दौर मुसीबतों का था ,
अच्छे बुरे का था ,
मेरे बिछड़ने का था।।
-) आंखे आज भी तेरा वो मुड़कर देखना ना भूली
सबकुछ भूली हैं तेरा वो हंसना ना भूली ।।
मुझे याद करता है जमाना ,
में तेरी वो यादें नहीं भूली ,
तू मुस्कुरा देता था मैं वो हँसी नहीं भूली ।।
-) तू ये भी वफ़ा का पैगाम ला ,
आशिक़ो का नाम ला,
किसने उड़ाई ये अफ़वाह मेरे बर्बाद होने की,
दिलो के महफ़िल से बेघर होने की ,
तू ये अहसान कर नाम कर,
वो जो है नहीं कुछ भी वो पैगाम ला ।।
*“दोस्ती वो नहीं जो सिर्फ पास हो, दोस्ती वो है जो हर एहसास में साथ हो।”*
बचपन की शरारतें, कॉलेज के दिन, लंबी बातें और हर मुश्किल में साथ निभाने का एहसास — ये सब हमारी शायरियों में जीवंत हो उठते हैं।
कभी-कभी इंसान भीड़ में रहकर भी अकेला महसूस करता है। उस तन्हाई को समझना आसान नहीं होता। “Hindi Best Shayari” पर आपको ऐसी शायरियाँ भी मिलेंगी जो अकेलेपन की उस खामोशी को महसूस कराती हैं जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है।
इन शायरियों में रातों की बेचैनी, अधूरी ख्वाहिशें, खोए हुए रिश्तों की याद और खुद से बातें करने का एहसास मिलता है।
*“खामोशी भी कभी-कभी चीखती है, बस सुनने वाला दिल चाहिए।”*
यह उन लोगों के लिए है जो अपने दिल की बात किसी से कह नहीं पाते, लेकिन शब्दों में अपना सुकून ढूंढते हैं।
~~आशुतोष दांगी















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